वात, पित्त, और कफ दोषों का शरीर में स्थान और भूमिका—संतुलन में रहने पर शरीर सुव्यवस्थित रूप से कार्य करता है; विकृत होने पर हानि होती है:
🌀 वात (Vāta)
- तत्व: आकाश + वायु
- शरीर में मुख्य स्थान:
- कोलन/बड़ी आंत (पेट का निचला भाग)
- नाभि से नीचे: छोटी–बड़ी आंत, कमर, जांघ, टांगें, हड्डियाँ ।
- फंक्शन: गति‑संवेदना, रक्तचाप, पसीना, मल‑मूत्र उत्सर्जन—शरीर की सभी गतियाँ और न्यूरोलॉजिकल क्रियाएं।
🔥 पित्त (Pitta)
- तत्व: अग्नि + जल
- शरीर में मुख्य स्थान:
- पेट और छोटी आंत
- छाती और नाभि का मध्य भाग
- लीवर, तिल्ली, पाचन–संस्थान, खून, मूत्र, पसीना ।
- फंक्शन: पाचन, चयापचय, हार्मोन व Enzyme नियंत्रण, शरीर की गर्मी, दृष्टि, बुद्धि ।
💧 कफ (Kapha)
- तत्व: पृथ्वी + जल
- शरीर में मुख्य स्थान:
- पेट का ऊपरी हिस्सा, छाती
- गले का ऊपरी भाग, कंठ, सिर, गर्दन
- जोड़ों, हड्डियों, वसा/चर्बी, कनेक्टिव टिशूज ।
- फंक्शन: शरीर को पोषण देना, स्थिरता, चिकनाहट व लुब्रिकेशन देना, प्रतिरोध क्षमता बढ़ाना
🧘♂️ सारांश:
| दोष | मुख्य स्थान | कार्य और लक्षण |
|---|---|---|
| वात | पेट/कोलन से पैर तक | गति, संवेदना, उत्सर्जन |
| पित्त | पेट, छोटी आंत, लीवर, खून | पाचन, गर्मी, चयाप्रक्रिया |
| कफ | छाती, कंठ, सिर, जोड़ों, वसा | पोषण, स्थिरता, चिकनाहट |
✔ संतुलन में रहकर ये दोष शरीर-मन को सुव्यवस्थित रखते हैं।
🚫 असंतुलन होने पर—जैसे वात की अधिकता से गैस, दर्द, अनिद्रा; पित्त की अधिकता से अम्लता, चिड़चिड़ापन; कफ की अधिकता से मोटापा, सुस्ती—तकलीफ होती है।
